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जीवन के इस मोड़ पर
कुछ भी कहा जाता नहीं।
अधरों की ऊ्योढ़ी पर
शब्दों के पहरे हैं।
हँसने को हैसते हैं
जीने को जीते हैं
साधन-सुभीतों में
ज्यादा ही रीते हैं।
बाहर से हरे-भरे
भीतर घाव मगर गहरे
सबके लिए गूँगे हैं-
अपने लिए बहरे हैं।
निर्देश (प्र.सं. 145 से 150 ):
निम्नलिखित काव्यांश को पढ़कर दिए गए प्रशनों के सही/सवसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनकर लिखिए। जीवन के इस मोड़ पर
कुछ भी कहा जाता नहीं।
अधरों की ऊ्योढ़ी पर
शब्दों के पहरे हैं।
हँसने को हैसते हैं
जीने को जीते हैं
साधन-सुभीतों में
ज्यादा ही रीते हैं।
बाहर से हरे-भरे
भीतर घाव मगर गहरे
सबके लिए गूँगे हैं-
अपने लिए बहरे हैं।
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