Concept:भाषा और बोली में वैज्ञानिक दृष्टि से कोई भेद नहीं होता। बोली भी एक भाषा होती है, जो सामाजिक प्रकार्य में किसी अन्य भाषा पर आश्रित रहती है।Explanation:भाषाविज्ञान की दृष्टि से बोली और भाषा में संरचनात्मक भेद करना संभव नहीं है।उदाहरण के लिए, खड़ी बोली (हिंदी) और उसकी बोलियाँ (ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मैथिली) सभी में समान व्याकरणिक प्रणाली होती है।अतः ये बोलियाँ भी भाषा की श्रेणी में आती हैं।नीचे दी गई तालिका में भाषा और बोली के सामाजिक प्रयोग में अंतर दर्शाया गया है, किंतु संरचनात्मक दृष्टि से कोई अंतर नहीं है।
भाषा
बोली
1. सामाजिक प्रकार्य में भाषा अध्यारोपित होती है।
सामाजिक प्रकार्य में बोली भाषा के अधिन होती है।
2. भाषा का क्षेत्रीय़ आधार अपेक्षाकृत अधिक विस्तृत होता है।
बोली का क्षेत्र, भाषा की तुलना में अपेक्षाकृत छोटा होता है।
3. भाषा का प्रयुक्ति क्षेत्र अधिक बहुमुखी होता है, क्योंकि यह साहित्य, शिक्षा, प्रशासन आदि अनेक व्यवहार क्षेत्रों में प्रयुक्त होती है।
बोली का प्रयुक्ति क्षेत्र सीमित होता है।
4. भाषा समाज में प्रतिष्ठा व प्रभुता की द्योतक होती है।
बोली समाज में प्रतिष्ठा का कारण नहीं बनती। उसका प्रयोग आत्मीयता का व्यंजन होता है।
5. भाषा का प्रयोग औपचारिक संदर्भों में होता है।
बोली का प्रयोग प्रायः अनौपचारिक संदर्भों में होता है।
6. भाषा, सापेक्षतया अधिक मानकीकृत होती है।
बोली में भाषा विकल्पन सापेक्षतया अधिक होती है।
7. भाषा अपनी विभिन्न बोलियों के प्रयोगकर्ता के बीच संपर्क भाषा का भी काम करती है।
बोली प्रायः मातृभाषा के रूप में ही प्रयुक्त होती है।